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लकी बिष्ट का दावा, 72 घंटे के टॉर्चर के बाद भी दिमाग शांत रखा पहली बार सुनाई पूरी कहानी

By CHILLFLIX ORIGINALS 13 Mar 2026 0 Comments

आखिर कौन है लकी बिष्ट?

भारत के पूर्व स्पेशल फोर्स कमांडो लकी बिष्ट एक बार फिर चर्चा में हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट पर लंबे समय से उनके बारे में कई तरह की कहानियां घूमती रही हैं—कोई उन्हें एजेंट लीमा बताता है, कोई स्नाइपर, कोई स्पाई, तो कोई कॉन्ट्रैक्ट किलर तक कह देता है।

लेकिन अब खुद लकी बिष्ट ने अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो जारी कर अपने जीवन से जुड़ी उस घटना की कहानी सुनाई है, जिसके बारे में उन्होंने दावा किया कि “यह सच्चाई किसी पॉडकास्ट या इंटरव्यू में कभी सामने नहीं आई।”

उनके मुताबिक, साल 2011 में एक डबल मर्डर केस में पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेकर 72 घंटे तक पूछताछ की, लेकिन आखिरकार सबूतों के आधार पर वह अदालत से बरी हो गए।

यह कहानी अब इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो रही है और लोगों के बीच नई बहस छेड़ रही है।

क्या हुआ था उस दिन? — लकी बिष्ट का दावा

लकी बिष्ट के अनुसार, 6 सितंबर की सुबह लगभग 6–7 बजे वह अपने घर पर सो रहे थे, तभी अचानक पुलिस की 10–12 गाड़ियां उनके घर के बाहर आकर रुक गईं।

उन्होंने बताया कि पुलिस ने पूरे घर को घेर लिया और दरवाजे पर जोर-जोर से दस्तक देने लगी।

“पुलिस पूरी हथियारों के साथ घर में घुसी। मेरे घरवालों के लिए यह नया अनुभव था, लेकिन मेरे लिए नहीं,” उन्होंने वीडियो में कहा।

लकी बिष्ट के मुताबिक उस समय एसएसपी, कोतवाल और कई पुलिस अधिकारी मौके पर मौजूद थे। पुलिस ने उनके घर की तलाशी ली और उनके दो लाइसेंसी हथियार जब्त कर लिए।

इसके बाद उन्हें हल्द्वानी की एक कोतवाली ले जाया गया, जहां पहले से पुलिस की टीमें मौजूद थीं।

वह दावा करते हैं कि पूछताछ के दौरान एक वरिष्ठ अधिकारी ने उनसे कहा:

“मैं यह नहीं पूछूंगा कि कल रात दो लोगों की हत्या क्यों की, मैं पूछ रहा हूं कि किसके कहने पर की?”

लकी बिष्ट ने जवाब दिया कि उन्होंने कोई हत्या नहीं की है और उस समय वह हाल ही में इमरजेंसी लीव पर घर आए थे। उन्होंने यह भी कहा कि इससे पहले वह लालकृष्ण आडवाणी के पर्सनल बॉडीगार्ड के रूप में तैनात थे।

पूछताछ, हथियार और पुलिस का शक

लकी बिष्ट का कहना है कि पुलिस को शक था कि डबल मर्डर में इस्तेमाल हुई गोली का बोर उनके हथियार से मिलता है।

उनके मुताबिक एक अधिकारी ने उनके हथियार को देखकर कहा कि “तुमने इसे अच्छी तरह साफ कर दिया है, कल रात इसी से दो लोगों को शूट किया है।”

उन्होंने दावा किया कि पुलिस अधिकारी ने उनकी पिस्टल से दो राउंड हवा में फायर भी किए।

हालांकि बाद में हथियार और बुलेट को फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) भेजा गया।

लकी बिष्ट का आरोप है कि पूछताछ के दौरान उन्हें लगातार 24 घंटे से अधिक समय तक टॉर्चर किया गया और उन पर कबूलनामे का दबाव बनाया गया।

कैसे मिला पहला सबूत जिसने केस बदल दिया

लकी बिष्ट के मुताबिक 7 सितंबर की शाम एक व्यक्ति आया, जो पुलिस अधिकारी नहीं बल्कि फॉरेंसिक लैब का वैज्ञानिक था।

उसने उनके फिंगरप्रिंट लेने शुरू किए।

लकी बिष्ट का दावा है कि उन्होंने उस वैज्ञानिक से कहा कि कागजों पर समय और तारीख लिखकर साइन कर दे।

उनके अनुसार उस दस्तावेज़ पर 7 सितंबर 2011 की तारीख और शाम 5:30 बजे का समय दर्ज किया गया।

लेकिन पुलिस रिकॉर्ड में यह दिखाया गया कि उनकी गिरफ्तारी 8 सितंबर को हुई थी।

जब यह मामला अदालत में पहुंचा तो एक बड़ा विरोधाभास सामने आया।

अगर गिरफ्तारी 8 सितंबर को हुई थी, तो 7 सितंबर को उनके फिंगरप्रिंट कैसे लिए गए?

लकी बिष्ट का दावा है कि यही पहला सबूत था जिसने केस की दिशा बदल दी।

फॉरेंसिक रिपोर्ट ने भी बदली तस्वीर

लकी बिष्ट के अनुसार दूसरा महत्वपूर्ण सबूत तब सामने आया जब चंडीगढ़ एफएसएल की रिपोर्ट आई।

उस रिपोर्ट में बताया गया कि जिस पिस्टल से फायरिंग का आरोप लगाया जा रहा था, उससे कोई गोली चली ही नहीं थी।

उनका कहना है कि इन दो सबूतों के आधार पर अदालत ने उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया।

‘एजेंट लीमा’ विवाद और सोशल मीडिया की कहानियां

लकी बिष्ट का नाम इंटरनेट पर अक्सर “एजेंट लीमा” के रूप में भी जोड़ा जाता है।

हालांकि उन्होंने इस विषय पर सीधा दावा नहीं किया।

उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि लोग उनके बारे में अलग-अलग बातें करते हैं और हर व्यक्ति को अपनी राय रखने का अधिकार है।

उनके मुताबिक:

“मैं सिर्फ इतना कहता हूं कि मैंने अपना बचाव किया और आखिरी सांस तक कोशिश की।”

सोशल मीडिया पर उनके बारे में कई दावे किए जाते हैं—

लेकिन इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

विशेषज्ञों की नजर में यह मामला क्यों महत्वपूर्ण

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार इस कहानी का एक महत्वपूर्ण पहलू जांच प्रक्रिया और फॉरेंसिक सबूतों की भूमिका है।

अगर गिरफ्तारी की तारीख और फिंगरप्रिंट रिकॉर्ड में विरोधाभास साबित हो जाए, तो अदालत में केस कमजोर पड़ सकता है।

क्रिमिनल लॉ एक्सपर्ट मानते हैं कि ऐसे मामलों में डॉक्यूमेंटेशन और फॉरेंसिक रिपोर्ट निर्णायक भूमिका निभाती हैं।

निष्कर्ष

लकी बिष्ट की यह कहानी एक ऐसे केस की झलक देती है जिसमें पुलिस जांच, फॉरेंसिक रिपोर्ट और कानूनी प्रक्रिया तीनों अहम भूमिका निभाते हैं।

हालांकि उनके बारे में इंटरनेट पर कई दावे और कहानियां मौजूद हैं, लेकिन उन्होंने अपने वीडियो में सिर्फ इतना कहा कि उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी शांत दिमाग से सोचा और अपने बचाव का रास्ता खोजा।

अब यह कहानी फिर से चर्चा में है और लोगों के बीच बहस जारी है कि आखिर लकी बिष्ट कौन हैं—एक पूर्व कमांडो, एक रहस्यमय एजेंट या सिर्फ विवादों से घिरा एक व्यक्ति।

Tags: #agent lima #Lucky Bisht #the real story #who is lucky bisht
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